Ethanol Blending Sugarcane India: भारत में २०२६ यह साल बायो एनर्जी और चीनी उद्योग के लिये बेहद अहम माना जा रहा हैं। दरअसल दुनियाभर के चीनी उत्पादन में काफी गिरावट आई हैं। क्योंकी लोग अब चीनी बनाने से ज्यादा इथेनॉल जैसे उत्पादन पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं क्योंकी गाड़ीयों में अब पेट्रोल के साथ इथेनॉल मिलाकर फ्युयल की तरह इस्तमाल किया जा रहा हैं। दुनियाभर में कच्छे तेलो की किंमते बढ़ती है तो इथेनॉल की मांग भी बढ़ जाती हैं। इसलिये भारत के साथ साथ अब कई देश इथेनॉल का उत्पादन तेजी से बढ़ा रही हैं। इस बदलाव से दूनियाभर में चीनी स्टाॅक की तेजी में मानो ब्रेक लग गया हैं। बाजार में चीनी की मात्रा पहले के मुकाबले कम हो गई हैं।

बढ़ते उत्पादन की स्थिती
साल २०२५-२६ चीनी उत्पादन में थोड़ी कमी आई हैं। लेकिन साल २०२६-२७ काफी अच्छा होगा ऐसा काफी जा रहा है। इसके अनेक कारण हैं पिछले २ सालों से बारिश की स्थिती काफी अच्छी रही हैं, जिससे खेतों में पाणी की स्थिती काफी सुधरी हैं। गन्ने के खेती के लिये पाणी की काफी जादा जरुरत होती है और अगर बारिश होती है तो फसल भी अच्छी होती हैं। इस वजह से इस बार किसानों को बहुत ज्यादा उम्मीद दिखाई दे रही हैं। इस साल कुल फसलों में २% पर लगभग गन्ने कि फसल लगाई गई है।
भारत में महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में सबसे ज्यादा गन्ने की खेती की जाती हैं। कुल उत्पादन मे इन ३ का कुल ६०% हिस्सा होता है। अगर इन राज्यों में उत्पादन अच्छा रहा तो कुल उत्पादन भी अच्छा रहता हैं। इस बार अनुमान यह है की साल २०२६-२७ में भारत में गन्ने और चीनी का उत्पादन बढ़कर 33.6 मिलियन टन तक पहुंच सकता हैं। इससे पता लगता है की चीनी का उत्पादन इस बार रेकार्ड तोड सकता हैं और जरुरत पढने पर इसे निर्यात भी किया जा सकता हैं।
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निर्यात स्थिती और निती जाने
भारत सरकार ने अभी तक बाहर देश के निर्यात पर अभी कोई प्रतिबंध नहीं लगाया है इसलिये गन्ने के किसान और मिले अपना उत्पादन बाहर एक्सपोर्ट कर सकते हैं। बताया जा रहा है की भारत इसबार लगभग 3.6 मिलियन टन चीनी निर्यात कर सकता है। हालाकी यह बाद में बदल भी सकता है। यह घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कींमतो पर निर्भर करता हैं। अगर देश में चीनी की किंमते कम होगी तो निर्यात भी कम होगा और यह किंमते ज्यादा होंगी तो निर्यात भी ज्यादा होगा।
अल-नीनो का संकट
हालाकी इस बार उत्पादन बढ़ने की उम्मीद तो हैं पर सबसे बड़ा खतरा है अल-नीनो का। अल-नीनो एक प्राकृतिक मौसम में होनेवाला बदलाव है जिसमें कई बार बारिश कम होती है और गर्मी ज्यादा रहती हैं। इस बार भारत और थाईलैंड में इसका असर जादा रह सकता है ऐसा अनुमान है। अगर ऐसा होता है तो गन्ने के फसलों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता हैं।
अगर अल नीनो का असर भारत और अन्य देशों में होता है तो चीनी के उत्पादन पर इसका सीधा असर देखने को मिल सकता हैं। इसका असर अगले साल की फसल पर भी पड़ता हैं। इसलिये किसानों और सरकारों को अगले २ साल तक इस परिस्थिति पर ज्यादा ध्यान रखना होगा।
जैव-ऊर्जा का बढ़ता महत्त्व
अब गन्ने का उत्पादन चीनी तक सिमित नहीं रहा है अब वह इथेनॉल उत्पादन में भी होगा। सरकार का लक्ष है की इसका ज्यादा से ज्यादा उपयोग में लाकर प्रदुषण को कम से कम किया जाये और विदेशी तेल पर निर्भरता कम की जाये। अब भारत में इथेनॉल की बनाने की क्षमता जरुरत से ज्यादा हैं। भविष्य में इसे और बढ़ाने और नई तकनिकी अपनाने की जरुरत हैं।
कुछ मंत्री और विशेषज्ञ यह राय दें रहे हैं की आनेवाले समय में ज्यादा से ज्यादा ऐसे वाहन बनाये जाये जो ज्यादा से ज्यादा इथेनॉल जैसे इंधन पर चल सके। इससे पर्यावरण को भी फायदा और किसानों की उत्पादन को ज्यादा फायदा मिल सके।
इथेनॉल के अलावा मक्का, खराब अनाज का भी उपयोग इथेनॉल बनाने में किया जाता है।
फैक्टरीयो पर आर्थिक दबाव
इसमें आगे की स्थिती तो बेहतर दिख रही हैं लेकिन मिलों अथवा फैक्टरीयों पर आर्थिक दबाव बढ़ता दिख रहा है क्योंकी कई जगह तो उत्पादन लागत चीनी के दाम कम हैं। इससे मिलों को बढ़ा नुकसान उठाना पड़ रहा हैं। सरकार न्यूनतम बिक्री मूल्य बढ़ाए ताकी उन्हें नुकसान ना हो और साथ में किसानों को भी उसका सही भुगतान हो क्योंकी यह समस्या हल साल देखी जाती हैं।
सब मिलाकर देखा जाये तो साल 2026-27 का समय भारत देश के लिए उम्मीद और सावधानी दोनो का समय है। एक तरफ उत्पादन बढ़ने की संभावना है और जैव-ऊर्जा क्षेत्र मजबूत हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ मौसम और एल नीनो जैसी चुनौतियाँ भी सरकार के सामने हैं।अगर मौसम सही रहा तो भारत की अर्थव्यवस्था और किसानों दोनों को बड़ा लाभ मिल सकता है।
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